उपन्यास, अजनबी, आंसू ... और जवान होता रिश्ता...

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ऊंघते दिनों में जबकि दोपहर सर पर होता ,ग्राहक गली से बाहर आने से परहेज करते, मैं कई दुकानदारों को मोटी-मोटी किताबों में सर घुसाए हुए देखता । पढने के उनके सामर्थ्य और ललक को देखकर चौंधिया जाता । हम ठहरे विद्यार्थी... बस्ते में किताब होना हमारी मजबूरी ठहरी। दोपहर की घंटती बजती तो सीधे मैदान में... और दोपहर शुक्रवार का हो तो फिर पूछिए मत, खेला पूरे डेढ़ घंटे चलता। गेंद फेंका-फेंकी से लेकर पिट्टो तक सारे खेल खेल-खेल कर पस्त होकर ही वापस लौटते। पढाई उतनी ही करते जितनी क्लास में मास्टर साहब पढ़ा देते और ट्यूशन वाले मास्टर साहब से डांट नही सुननी पड़ती।  लेकिन इन पढ़ाकों के हौसले और जज्बे को देखकर सलाम करने को मन करता। कई बार पान की गुमटी और तंबाकू की दुकानों पर ऐसी भारी-भरकम किताबें पड़ी मिलती। लगता कि पढ़ाई-लिखाई का ठौर-ठिकाना केवल स्कूल ही नही है। इसी जिज्ञासा का परिणाम था कि उपन्यास शब्द ने मेरे शब्दकोष में अपनी जगह बनायी। आकर्षण अभी बाल्यावस्था में ही था कि उपन्यास के जन्म-जन्मांतर के शत्रु अपने-अपने बिलों से बाहर निकलते मिले। किसी ने कहा-निठल्ला पुराण है तो किसी ने बेरोजगारी से इसका द्वंद्व समास यानि लोटा-डोरी वाला रिश्ता बताया। यानि कुल मिलाकर विरोधी पक्ष की बातों का सार यह था कि यह कोढ़ का कारण तो है ही उसका लक्षण भी है। उपन्यास के प्रति उपजा आकर्षण गर्भ में ही मृत हो गया ... हालांकि यह भी कह सकते हैं कि सुसुप्त हो गया। (बाद में पता चल इन भारी-भरकम पोथों को लुग्दी साहित्य भी कहते हैं।)

       साहित्य के नाम पर पाठ्यपुस्तकों से इतर दसवीं तक मैने कोई झांका-झांकी नही की। किताब-पत्रिका की दुकान पर पाठ्यपुस्तकें जहां आलमारियों में गरिमामयी अंदाज में जमी रहती, वहीं इंडिया टूडे, माया, प्रतियोगिता दर्पण से लेकर सरस सलिल आगे मेज पर पड़ी रहती। एकाध बार कनखियों से सरस सलिल को देखा जरुर था। तब तक सरस-सलिल बदनाम पत्रिका के तौर पर युवा और अधेड़ जगत में अपनी प्रतिष्ठा पा चुकी थी। उड़ती-उड़ती चर्चाएं तो खूब सुन रखी थी लेकिन उसके पन्नों तक पहुंचने से पहले ही हिम्मत जबाव दे देती, ऊंगलियां खुद-ब-खुद सिकुड़ जाती और फिर पड़ोस में लटके इंडिया टूडे को इस प्रकार टटोलने लगती कि किसी को मेरी मंशा पर सुई भर का भी शक न हो।

       हालांकि छठी से लेकर दसवीं तक की बिहार बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों में मशहूर लेखकों की कहानियां और कविताएं पढ़ी थी। नागार्जुन की 'अमल-धवल गिरी के शिखरों पर बादल को घिरते देखा है' वाली कविता पाठ्यपुस्तक का हिस्सा थी, सुदर्शन की कहानी 'हार की जीत' को छठी क्लास में चाव से न जाने कितनी बार पढ़ा था। हिंदी के हमारे टीचर थे- लड्डू चौधरी । क्लास में खड़ा करवा-करवा कर हर किसी से एक-एक पैरा पढ़ने को कहते । मुझे याद है कि सातवीं क्लास में किसी कहानी के एक पैरा की शुरुआत में डार्लिंग शब्द था और क्लास के बच्चे इस जुगत में थे कि इस पैरा को पढ़ने के लिए उनका ही नंबर आए। वैसे पढ़ने के लिए तो लालू-चालीसा भी पढ़ा था- 'कुंदन राय मरछिया देवी, के संतान, जगत तुम खेवी'। लेकिन मोटे तौर पर यह था कि मेरे लिए साहित्य से संबंध पाठ्यपुस्तकों की परिधि में ही गोल-गोल घूमता रहा।

      बारहवीं के बाद पटना से बनारस पहुंचने के बाद उपन्यास से पुनर्परिचय हुआ ... और इस बार जो रिश्ता बना वो समय के साथ और-और जवान होता जा रहा है। हुआ यूं कि बीए फर्स्ट ईयर के शुरुआती दिन थे। पहली बार घर से दूर एकदम छूट्टा टाइप हुए थे। कोई रोकने-टोकने वाला नही। दिन में क्लास जाओ और शाम में कॉमन-रुम में टीवी भकोसो। फिल्म,न्यूज,गाना जो भी चले भकोसते रहो। रात के खाने के बाद तमाम तरह की फिल्में कॉमन रुम में चलती । चलती तो फिर रुकने का नाम न लेती। कुछ वीर-बांकुरे सुबह गोधूलि-बेला तक फिल्म का पान करते। ऐसे ही दिनों में एक मित्र जो कभी-कभार होस्टल में आतिथ्य फरमाते गुनाहों का देवता लेकर अवतरित हुए। हम भी पूरे फ्री थे। संयोग से मांगने पर उन्होंने अपनी आदत के विपरित वो किताब दे भी दी। एक बार जो बैठे उठा ही नही गया। सुधा, विनती, चंदर में ही घूमने लगे। अक्षय कुमार, विपाशा बसु वाली फिल्म अजनबी कॉमन रुम में चलनी शुरु हो चुकी थी। अगल-बगल के कमरे खाली हो गए थे ... और मैं रोया जा रहा था । सुधा और चंदर का दुख मेरे अंदर धंस सा गया। शुक्र था कि पूरी की पूरी लॉबी वीरान थी और कोई संयोगवश भी मेरे कमरे में नही आया । किसी ने यह नही पूछा कि मेरा कोई स्वर्ग सिधार गया है क्या।  यह उपन्यास से मेरे रिश्ते की शुरुआत थी। उपन्यासों के अजनबी पात्र अब अपने लगने लगे।



“दुनिया वालों से दूर, जलने वालों से दूर ... “

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कई महीनों से कहीं घूमने नही जा पाने की वजह से बीवी के निशाने पर था । घूमने के मुद्दे पर घमासान वार्ता चल ही रही थी कि अचानक एक क्षण ऐसा आया जब घूमने की तिथि पर न्यूनतम साझा सहमति बन गयी। हालांकि जाना कहां है, इस पर पक्के तौर पर मुहर नही लगी।

      इन्हीं दिनों हम कॉपरनिकस मार्ग के अपने ऑफिस से टहलते-टहलते सफदर हाशमी मार्ग के कोने पर खड़े हिमाचल भवन के करीब से गुजर ही रहे थे कि शिमला जाने का विचार अकस्मात उभरा। अंदर ही हिमाचल टूरिज्म वालों का एक छोटा सा ऑफिस है। हमारे दिए दिनों में उनके शिमला के होटलों में बस एक दिन की ही बुकिंग उपलब्ध थी । हिमाचल टूरिज्म वालों ने चैल जाने का विकल्प सुझाया - चैल पैलेस में बचे दूसरे दिन के लिए कमरा खाली था । छत्तीस के छत्तीस न सही लगभग बत्तीस-तैंतीस गुण तो मिल ही गए। बस-होटल की बुकिंग कर-कराकर ही हम वापस लौंटें ।
शिमला

चैल पैलेस


       कुछ ऐसा ही वाकया कुछ सालों पहले हुआ जब राजकुमार हिरानी की टीम को थ्री इडियट्स की शूटिंग के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज से अनुमति नही मिली तो चैल पैलेस विकल्प के तौर पर अचानक से उभरा और बेचारे रणछोड़ दास चांचड़ के बाप के भस्म में परिवर्तित होने के बाद के दृश्य यहां फिल्माए गए।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज

चैल पैलेस


         वैसे कहने वाले तो यह कहते हैं कि पाटियाला के राजा भूपिंदर सिंह जब वायसराय की बेटी को शिमला से भगाकर ले गए तो शिमला उनके लिए दिल्ली-दूर हो गया । फिर चैल उनके लिए विकल्प के तौर पर उभरा। राजा साहब तो ठहरे राजा साहब .... उन्होंने चैल में अपना डेरा-डंडा जमा लिया। चैल है भी बेपनाह खूबसूरती समेटे, ऊपर से तुर्रा यह कि ऊंचाई भी शिमला से ज्यादा । ऊंचाई का जिक्र-ए-अंदाज ऐसा कि सुनाने वाले ने अभी-अभी इतिहास में छलांग लगायी हो राजा साहब के और चौड़े हुए सीने को अभी-अभी इंच-टेप से पैमाइश की हो या फिर वायसराय को उनकी बग्घी से ढ़केल कर अभी-अभी लौटा हो । कहने वाले तो ऐसे कहते हैं मानो राजा साहब उनके सामने ही वायसराय की सुपुत्री को लेकर चंपत हो गए हों। कुछ कहते हैं कि बेटी वायसराय की नही थी कमांडर-इन-चीफ लॉर्ड किचनर की थी। हालांकि ठोस इतिहास कहता है कि राजा साहब बमुश्किल एक साल के थे जब चैल पैलेस ने आकार लिया। हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में स्कैंडल प्वांइट की लेखिका मंजू जेदका कहती है कि हो सकता है कि इस कहानी का जुड़ाव भूपिंदर सिंह से न होकर उनके पिता राजिंदर सिंह से हो। वो कहती है कि इस बात के प्रमाण है कि राजिंदर सिंह की एक अंग्रेज पत्नी थी , जिनसे उन्हें एक बेटा भी हुआ था । उनके मुताबिक भूपिंदर सिंह के इस कहानी का किरदार होने की वजह उनकी रंगीन तबियत हो सकती है।... वैसे 'वायसराय की बेटी और महाराजा की दंतकथा' ने किन परिस्थितियों में जन्म लिया , कब कौन सी करवट ली और कैसे वायसराय , लॉर्ड किचनर और चैल पैलेस इससे जुड़ते चले गए, यह जानना रोचक होगा। समय का समंदर कुछ चीजों को अपने पेटे में ले लेता है और कुछ को उछालकर किनारे पटक देता है। शायद कभी भविष्य में इस दंतकथा के पीछे की सत्यकथा भी उद्घाटित हो।

         शिमला की भीड़भाड़ से दूर हम चैल पैलेस पहुंचे तो समय ठहर सा गया । दिल्ली की भागमभाग और शिमला की चहल-पहल चैल पैलेस के चारों तरफ फैले विशालकाय देवदार पेड़ों को लांघ नही पायी । वर्तमान को पृष्ठभूमि में ठेलकर इतिहास मंच पर मुख्य भूमिका में था । अंदर रेस्तरां में फिल्म उजाला का गाना बज रहा था- दुनिया वालों से दूर , जलने वालों से दूर ... आ जा, आ जा चलें कहीं दूर ...। 

          चैल पैलेस की ऊंची छतों और एंटीक फर्नीचर वाले रेस्तरां में बैठे फिल्म दाग का राजेश खन्ना का वो डायलॉग भी याद आया – "इज्जतें , शोहरतें,चाहते, उल्फतें... कोई भी चीज दुनिया में रहती नही ... आज मैं हूं जहां कल कोई और था ...ये भी एक दौर है, वो भी एक दौर था ।" चैल की खूबूसरत सुरंग से होकर मैं अतीत, वर्तमान और भविष्य में एक साथ डुबकी लगाने लगा । .... मैं अपने-आप में सिमटता जा रहा था । चैल एक सुखद संयोग था, स्मृतियों में संजोने लायक । बताते चलें कि राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और राखी अभिनीत हिट फिल्म दाग के कुछ दृश्य चैल में फिल्माए गए।


बरास्ते करांची : कभी दलसिंहसराय से लिपटी थी सफेद सिगरेटी चमड़ी...

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
स्कूल के दिनों में घर से बाहर निकलता तो लिखा देखता – “पनामा पीने वालों की बात ही कुछ और है “। साथ ही आधे उजले और आधे पीले डब्बे से कुछ सिगरटें बाहर खुली हवा में ताका-झांकी करती दिखती। अपनी सफेद काया में हर जाति-धर्म-उम्र के लोगों को अपनी ओर खींचने की अकुलाहट उनमें साफ-साफ दिखती। हालांकि खैनी और बीड़ी का जलवा तो था ही, लेकिन गोरेपन को ऐसे इलाके में कौन नकार सकता है जहां हर सास को अपनी बहू और हर संभावित पति को गोरी ही लड़की चाहिए ।

और लगभग यहीं कालखंड होगा जब गोपी बाबू से गणित, भौतिकी, रसायन की ट्यूशन के लिए हम मंसूरचक के रास्ते में उनके मकान की ओर हर शाम रुख करते। इसी रास्ते पर दलसिंहसराय स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 2 के समांतर एक बड़ी चहारदिवारी से घिरी एक जगह थी । बाहर से अंदर का कुछ भी नही दिखता ... सिवाय बड़े-बड़े पेड़ों के आसमान की ओर बढ़ते सर और धड़ । लोग कहते कि यह सिगरेट फैक्ट्री है। वैसे हमारे सामान्य ज्ञान वाली किताब में बिहार के कारखानों की सूची में इसका जिक्र नही था। पता चला कि काफी पहले ही बंद हो गयी।

वैसे तो हमारा इलाका मोटे तौर पर खैनी और बीड़ी टाइप का था, लेकिन शौकीन मिजाज सिगरेट का भी लुत्फ उठाते । जब भी 'सिगरेट फैक्ट्री के करीब से गुजरता जिज्ञासाएं स्वभाविक रुप से जाग जाती । आखिर दलसिंहसराय और सिगरेट के बीच आखिर रिश्ता क्या है, कैसा था ? कितना पुराना है ? क्या अब भी रिश्ते की कोई डोर बची रह गयी है या फिर समय ने सारे पुराने रिश्ते कतर दिए हैं।

फिर धीरे-धीरे समझ में आया कि दलसिंहसराय और सिगरेट के बीच का रिश्ता साधारण सा नही है, एतिहासिक है, और इस एतिहासिक रिश्ते में कोई अनहोनी नही थी । दरअसल सरैसा परगना के तंबाकू की प्रसिद्धि का अपना इतिहास रहा है। इंडियन सिविल सेवा से जुड़े एल एस एस ओ मैली ने 1907 के दरभंगा जिले के गजेटियर में लिखा है कि सरैसा परगना के तंबाकू की ख्याति उत्तर बिहार की सीमा की पाबंद नही थी। सरैसा जिले का सबसे बड़ा परगना था, मुजफ्फरपुर जिले के साथ-साथ मुख्य रुप से यह दलसिंहसराय और समस्तीपुर थाने की परिधि में था। उन्होंने लिखा है कि दरभंगा जिले में तंबाकू के कुल खेत के सात का पांचवा हिस्सा समस्तीपुर और दलसिंहसराय थाने में था।

हालांकि तंबाकू भारत की मौलिक वस्तु नही है, इसके दादा-परदादा विदेशी थे, समंदर पार के, जहां जाने का मतलब ही धर्म-भ्रष्ट हो जाना है। पुर्तगाली इसे लेकर आए और हालत अब ऐसी हो गयी कि किसी भी मोड़ और नाली के ऊपर बनी गुमटी पर तंबाकू की लड़ी, उसे कच-कच कर कतरने वाला यंत्र और प्लास्टिक-स्टिल की चिनौटी न दिखे तो समझिए कस्बा-गांव ही मरा हुआ है, सार्वजनिक बहस की परंपरा समाप्त हो गयी है , समानता खतरे मे हैं , अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो गयी है। हालांकि पोलिथीन-प्लास्टिक युग के प्रसार में अब खैनी और चूना भी पैकेटबंद हो चले हैं।

खैर हुआ यू कि साल 1902 में दुनिया के सबसे बड़े तंबाकू फर्मों में शुमार ‘द अमेरिकन टोबैको कंपनी’ और ‘इंपीरियल टोबैको कंपनी’ ने सालों से छिड़े कीमतों को लेकर होने वाली प्रतिस्पर्धा को खत्म करने का फैसला लिया तो उन्होंने अपने प्रभाव वाले इलाके को छोड़कर बाकी दुनिया के लिए एक नयी कंपनी ‘ब्रिटिश अमरिकन टोबैको कंपनी( बैट)’ बनायी, जो यूके और यूएसए से बाहर के इलाकों में अपना कारोबार जमाती । स्वाभाविक रुप से बैट की निगाह तब के ब्रिटिश उपनिवेश भारत पर भी गयी। बिहार उन महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक था जहां बैट ने अपने तंबू गाड़े और फिर दलसिंहसराय की दखल तो अब स्वाभाविक ही थी।

भारत में सिगरेट ने सबसे पहले गोरे साहब की उंगलियों के बीच जगह बनायी, भीतर भूरे साहब इसकी चपेट में आए। कंपनी ने अभी ब्रिटिश प्रवासियों के दायरे से बाहर निकल कर भारतीयों के बीच सिगरेट के प्रचार-प्रसार की शुरुआत ही की थी कि उसे सबसे बड़ा धक्का लगा 1905 के स्वदेशी आंदोलन से। ऐसे में सिगरेट के आयात पर भी लगाम लगी। इन्हीं परिस्थितियों में भारत में सिगरेट उत्पादन के लिए बैट ने नंबवर 1905 में लंदन में पेनिनसुलर टोबैको कंपनी बनायी । जे टी विल्की के प्रबंधन में एक अस्थायी फैक्ट्री करांची में लगी, जिसने स्थानीय तौर पर प्राप्त तंबाकू पत्तों और बोनसाक मशीनों के जरिए जून 1906 में सिगरेट को बाजार के लिए उतारा। लेकिन कुछ समय बाद यह साफ हो गया कि तंबाकू पत्तों के भंडारण और सिगरेट उत्पादन से जुड़े दूसरे कामों के लिए करांची सही जगह नही है। ऐसे में कलकत्ता के करीब गंगा नदी के किनारे बिहार के मुंगेर में नजदीक के तंबाकू उत्पादन-क्षेत्र को देखते हुए मार्टिन एंड को के द्वारा बैट के लिए सिगरेट कारखाना बनाया गया । एफ.ए.पार्किंसन श्रीलंका (तब के सीलोन) से पेनिनसुलर के पहले प्रबंध निदेशक के तौर पर लाए गए।

बैट ने स्थानीय स्तर पर उत्पादित तंबाकू की खरीद के लिए 3 जुलाई 1912 को कलकत्ता में इंडियन लीफ टौबेको डेवलपमेंट कंपनी बनायी। जिसने एक अमरिकी रॉबर्ट सी. हैरीसन के नेतृत्व में काम करना शुरु किया। हैरिसन ने लोगों को ऐसी किस्म के तंबाकू उत्पादन को लिए प्रोत्साहित करना शुरु किया जो सिगरेट के लिहाज से ज्यादा बेहतर हो। हालांकि स्थानीय लोगों के द्वारा तंबाकू की क्यूरिंग या सुखाने की प्रक्रिया बहुत ही अपरिष्कृत थी , ऐसे में 1908 में शाहपुर पटोरी और खजौली के बेकार पड़े नील कारखानों में रिड्रांइग प्लांट स्थापित किए गए। फिर बाद में बढ़ती जरुरतों को देखते हुए साल 1912 में दलसिंहसराय में इन दोनों से काफी बड़ा रिड्रांइग प्लांट स्थापित किया गया। यही वह साल था जब मुंगेर फैक्ट्री के द्वारा स्थानीय स्तर पर उत्पादित तंबाकू से मदारी, बैटलएक्स और रेड लैंप ब्रांड के सस्ते सिगरेट का उत्पादन शुरु हो गया। (क्रमश: )

जर्मनी को जुकाम और दलसिंंहसराय की करवट ...

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
जर्मनी और दलसिंहसराय के बीच की दूरी कोई मामूली नही है। दलसिंहसराय से दिल्ली ही करीब सवा हजार किलोमीटर है। आखिर ऐसे में किसी जर्मन के दिमाग में कोई खुजली हो तो फिर दलसिंहसराय में बैठे शख्स को क्या शिकायत होगी या फिर उसकी क्या उत्सुकता होगी ? खैर अभी तो इंटरनेट है, पनिया जहाज से लेकर हवाई जहाज पर सवारी आसान हो गयी है। लेकिन सौ साल से भी पहले की सोचिए , जब समदंर पार का सफर भी पाप था, धर्म भ्रष्ट हो जाता था। तब किसी जर्मन के दिमाग की किस जुगाली ने दलसिंहसराय वालों की जिंदगी ही कमोबेश पलट कर रख दी हो, बड़ा बदलाव किया हो । शायद बात केवल दलसिंहसराय का ही नही बहुत कुछ इस विशाल देश की भी है । कह सकते है कि समय का एक चक्र होता है, चीजें बदलती रहती है। कहने वाले कह गए हैं – जो आया है सो जाएगा, राजा-रंक-फकीर। दलसिंहसराय भी गवाह बना एक बड़े वैश्विक चक्र का। जब यूरोपीय ताकतें एक दूसरे से ज्ञान-विज्ञान से लेकर रणभूमि में एक-दूसरे से उठापटक में लगी थी, हजारों मील दूर एक कोने में बलान नदी के किनारों पर भी हलचल हुई।

हालांकि जर्मनी और दलसिंहसराय के एक सदी से भी पुराने इस रिश्ते पर मेरी नजर पिछले करीब दो दर्जन से भी ज्यादा सालों में नही गयी थी। लेकिन इधर की कुछ हलचलों के बीच अचानक ही एक दिन इस रिश्ते का आभास हुआ, जब मैं आंखमूंदकर बेसब्री से नींद की तलाश में अतीत-वर्तमान-अनदेखे भविष्य की धमनियों-शिराओं में प्रवाहित हो रहा था। इधर के दिनों में मेरे कई नए-पुराने रिश्तेदारों के साथ कई मित्रों ने भी जर्मनी के विभिन्न शहरों म्यूनिख, बर्लिन, बॉन का रुख किया है ।

   खैर हुआ यूं कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत होते-होते जर्मनी ने कृत्रिम तरीके से नील बनाने में महारत हासिल कर ली और इसकी चपेट में दलसिंहसराय भी आने से बच न सका, जहां के नील की ख्याति कुछ कम नही थी। दलसिंहसराय प्राकृतिक नील उत्पादन का बड़ा केंद्र था इसके सबसे बड़े नील फैक्ट्रियों में से एक की क्षमता तो करीब 22 हजार क्यूबिक फीट की  थी। बर्नाड कोवेंट्री एक नीलहे साहब हुए जो यहां नील की खेती से जुड़े थे और दलसिंहसराय के नील से जुड़े उपक्रम में उनका मालिकाना हक भी था। ख्याति ऐसी कि कॉवेंट्री प्रोसेस कही जाने वाली प्रक्रिया से तैयार होने वाले उत्कृष्ट नील की वजह से नील जगत में दलसिंहसराय कलर-फैक्ट्री के रुप में जानी जाती थी। इस इलाके में और आस-पास ब्रिटिश प्लांटर्स यानि निलहे साहब किसानों से नील की खेती करवाते और भारी मुनाफा बटोरते। लेकिन सिंथेटिक नील की बढ़ती लोकप्रियता ने नीलहे साहबों को होने वाले मुनाफे का बंटाधार कर दिया। 

नील फैक्ट्री और दलसिंहसराय नील को मिले अवॉर्डों की तस्वीरें
 हालांकि नील इतना महत्वपूर्ण क्यूं है यह मैं आज तक समझ नही पाया। सिवाय बचपन से इन बातों के देखने कि यह सफेद बनियान को आकाशी रंग देता है और भक्क सफेद स्कूल वाले बुशर्ट को नीला बना देता है। हो सकता है और होगा ही कि इसके और भी ढ़ेर सारे काम होगें, लेकिन अपना पाला तो इन्हीं एक-दो मामलों में इससे पड़ा है। इतना याद है कि शायद पहले रॉबिन नील और फिर चार बूंदों वाले उजाला ने घर के एक अंधेरे कोने में अपनी जगह बना ली। हालांकि इस बात पर तो मेरा संदेह आज तक कायम है कि उजाला ने कभी मेरे बनियान-बुशर्ट में उजाले का संचार किया हो ।

नील की फैक्ट्री का एक दृश्य
खैर उन्नीसवीं शताब्दी के अंत होते-होते सिंथेटिक नील ने अपनी जगह बनानी शुरु कर दी और प्राकृतिक नील को कड़ी चुनौती मिलनी शुरु हो गयी , ठीक उसी तर्ज पर कि जब स्पिनिंग मशीन और पावरलूम के आविष्कार ने भारत को कपड़ों के निर्यातक की जगह उसका बड़ा आयातक बना डाला, कपड़ा उद्योग की कमर तोड़ दी । हालांकि ऐसा नही है कि प्राकृतिक नील ने सिंथेटिक नील के खिलाफ मुकाबले में दो-दो हाथ आजमाने से परहेज किया , लेकिन होनी को कौन टाल सकता है भला । दलसिंहसराय में ही कुछ नीलहे साहबों ने नील की फसल को और बेहतर बनाने के लिए साल 1899 के जुलाई महीने में बर्नार्ड कोवेंट्री साहब की देख-रेख में एक रिसर्च स्टेशन बनाया जहां नील की पैदावार और इसका प्रभाव बढ़ाने के लिए कई प्रयोग शुरु हुए। वैज्ञानिकों हैंकॉक, लीक और ब्लॉक्सम ने दलसिंहसराय के इस रिसर्च स्टेशन में नील से जुड़े अनुसंधान किए। नील से जुड़े नीलहे साहबों की लॉबी भी एक बड़ी वजह थी जिसकी वजह से इसी इलाके में पूसा में इंपीरियल एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट अस्तित्व में आया जो बाद में सन 1934 की भूकंप की वजह से आजकल इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट के रुप में दिल्ली के टोडापुर इलाके में विराजमान है। खैर नील की खेती को बेहतर बनाने के सिलसिले में पूर्वी एशिया में जावा द्वीप तक का चक्कर लगाया गया और नील की एक बेहतर किस्म को दलसिंहसराय और इसके आस-पास के इलाके में आजमाने की कोशिश की। यह रिसर्च स्टेशन आगे के कुछ सालों तक अनुसंधान में जुटा रहा और इससे कुछ निष्कर्षों तक पहुंच पाने में भी वैज्ञानिकों ने सफलता पायी थी। लेकिन सिंथेटिक नील से मुकाबला असंभव सा हो गया था।
बी कॉवेंट्री साहब के संबंध में 1915 में छपी जानकारी
हालांकि सिंथेटिक नील , पावरलूम जैसे आविष्कारों की वजह से ब्रिटिशों की नजर में भारत का महत्व किस परिमाण में छीजता जा रहा था और इसने सन 47 में उन्हें वापस अपने मुल्क लौटने के लिए कितना प्रेरित किया होगा, यह तो खैर इस मामले के विशेषज्ञ-विश्लेषक ही बता सकेंगें लेकिन मुझे लगता है कि इसका भी इसमें कुछ न कुछ अंशदान जरुर होगा , लेकिन इसमें कोई शक नही कि हजारों-हजारों मील दूर जर्मनी में अविष्कृत हुए सिंथेटिक नील ने दलसिंहसराय के इतिहास में एक नया मोड़ लाया होगा।

जगदलपुर- अनगिनत भारतीय संस्कृतियों का कटान-बिंदु

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बचपन में गणित पढ़ने के दौरान हममे से शायद ही कोई होगा जिसने वृत न बनाया हो। एचबी पेंसिल थामे डिवायडर और सफेद कागज यानि कि कच्चा माल मिला नही कि खूबसूरत वृतों का उत्पादन झमाझम शुरु। अपनी रिपोर्टिंग के पंचवर्षीय काल में खूब घूमने-फिरने को मिला। तीन हजार किलोमीटर लंबे और कमोबेश इतने ही चौड़े भारत का केंद्र क्या हो, यह सवाल अक्सर इन यात्राओं या फिर कभी किसी एकांत क्षण में फूटता। गुगल महोदय से कई दौर में दरियाफ्त की , कुछ जानकारियां सामने आयी। मसलन कि अंग्रेज नागपुर को भारत का केंद्र घोषित कर गए और इस लिहाज का एक पत्थर भी इसके सीने पर टांक गए। मसलन की उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर की घड़ी पूरे भारत का समय बताती है। लेकिन भारत बस भूगोल नही है,भारत संस्कृतियों का समुच्चय भी है। चीन की दीवार छलांगने में बस अब गिनती के ही कुछ दिन है। यहां से खाद-पानी पाती सभ्यताओं का एक लंबा इतिहास और वर्तमान है। ऐसे में यह जिज्ञासा लाजिमी है कि भारत की परिधि में मौजूद विभिन्न साभ्यातिक वृतों का आपस में कटान बिंदु क्या हो ?
जीरो माइल- नागपुर

साल 2009, आधुनिक भारत का सबसे बड़ा त्यौहार चुनाव दिल्ली से करीब डेढ़ हजार किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ में अपने परवान पर था। जगदलपुर के चांदनी चौक पर होटल बस्तरिया में यह मेरा तीसरा सप्ताह था। दीपावली गुजर चुकी थी और छठ दरवाजा खटखटा रहा थी। आम तौर पर प्रवासी बिहारी छठ को वापस अपने शहर-गांव एक नजर मारने का मौका नही चूकते। लेकिन दिल्ली से बने रहने के ऑर्डर की नाफरमानी कैसे कर पाता। छठ के दिन की शाम चाय की अनगिनत प्यालियों के साथ होटल के कमरे में ही कट गयी। लेकिन बेइंतहा इंतजार वाली सुबह इस बार अपने नसीब में नही थी, लेकिन सालों की आदत जाती कहां है। ब्रह्ममुहुर्त में ही नींद के प्राण उखड़ गये । अंधेरा छटने के इंतजार में शरीर कसमसाने लगा। दूसरे दिनों की तरह भांति-भांति के अखबार कोंचियाए आने को ही था कि अच्छी खासी संख्या में लोग छठ वाली दौरी सर पर रखे लौटते दिखे। मन ही मन माथा ठोकने लगा कि छठ अटैंड करने का एक खूबसूरत मौका अपनी हाथों से मैने कैसे आसानी से निकल जाने दिया। वो कहते हैं न कि सावधानी हटी , दुर्घटना घटी। यह तो पता था कि बिहारी मूल के लोग ठीक ठाक संख्या में यहां हैं , लेकिन छठ की बात दिमाग से गुजर नही पायी।





बस्तर दशहरा
वैसे भारत के नक्शे पर गौर फरमाए तो यह अंदाज लगाने में ज्यादा मुश्किल नही होगी कि जगदलपुर भारत के उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम के चौहारे पर जमा है। बगल के कोरापुट से ओडियाभाषी इलाका शुरु हो जाता है वहीं बस्तर कमिश्नरी और तेलुगूभाषी खम्मम भी अड़ोस-पड़ोस में है। वैसे व्यापार के सिलसिले में आए और फिर बस गए जैन/माड़वाड़ी व्यापारी भी अच्छी खासी तादाद में जगदलपुर और बस्तर कमिश्नरी के दूसरे छोटे-मोटे कस्बों में है। और जहां तक आदिवासी संस्कृति की बात है तो बस्तर इसके कुछ अंतिम पते-ठिकानों में से है। यानि कि जगदलपुर शहर में आपको हिंदी भाषा भाषियों के साथ, तेलुगू, ओडिया, मराठी और आदिवासी समाज के अनगिनत भाषाओं को बोलने वाले एक साथ ही मौजूद मिलेंगें।

करीब एक महीना नागपुर में रहा हूं और अच्छा खासा समय महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और इससे सटे भारत के मध्य के इलाके में गुजार चुका हूं । ऐसे में कोई जिज्ञासु तमाम भारतीय सभ्यताओं के कटान बिंदु के बारे में मेरी राय ले तो मैं नागपुर से करीब 500 किलोमीटर पूर्व जगदलपुर पर ही मुहर लगाउंगा।


एक स्वर्णिम इतिहास की कब्र पर उगा जंगल है पटना ...

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
पटना की बीमारी के पीछे का पैथोजेन यानि रोगाणु हर नए टीके को भकोस लेता है , म्यूटेट हो जाता है  । टीका बेचारा चकमा खा जाता है, बीमारी है कि मौजूद रहती है , खिलखिलाती है ,बस उसका हुलिया बदल जाता है । दरअसल सामाजिक न्याय की कई तगड़ी खुराकों को पस्त कर देने का नाम है पटना।

साल 2005 , करीब पंद्रह साल के बाद पटना का हुक्मरान बदल दिया गया। वजह साफ थी , सालों पहले जिस चेहरे ने राज्य बदल देने की बात की थी , वो खुद ही बदल गया। बाकी देश जहां अर्थव्यवस्था के हवाई सफर पर था , बिहार बदहाली की नई कहानी रच रहा था। ब्राह्मणवाद का विरोध कर लालू पटना की गद्दी पर बैठे और बिहार को विकास का भरोसा दिलाया था। लालू की दूसरी पारी की पहली तस्वीर कई ब्राह्मणों से कई किलो फूलों का माला गले में गटक जाने की थी। सामाजिक न्याय के मसीहा की इस बदली तस्वीर ने मगध की चिरपरिचित शांति पर सामाजिक न्याय मार्का मुहर लगा दी। कोट और हैट पहने लालू बिहार की तरक्की के लिए विदेश फिरते तो दिखे, लेकिन जमीं पर तरक्की का कोई निशान भी न छोड़ पाएं। ... लेकिन मगध अपने चेहरे पर चिरपरिचित शांति लपेसे अपनी जगह पर जमा रहा। सामाजिक न्याय की नयी फसल इक्का दुक्का जाति ने अपनी मनमर्जी से काटकर अपने दरवाजे पर रख ली।

साल 2005 को पैदा हुई उम्मीद भी अब मूर्च्छित हो चली है। बीते कुछ सालों से अफवाह गर्म थी कि राज्य रास्ते पर चल पड़ा है । देश भर की अखबारें पटना में सूर्योदय की खबरों से पटी पड़ी थी। लेकिन अभी दशक भी नही गुजरा था कि लगने लगा कि मगध की चिरपरिचित शांति की लपटों ने पाटलिपुत्र का दामन नही छोड़ा है। अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है , लक्ष्मणपुर-बाथे कांड के आरोपी पटना की ऊंची अदालत द्वारा बरी कर दिये गये। एक साल के नवजात से लेकर बुढ़े-बुर्जुगों तक की हत्या के मामले में प्रशासन अदालत की नजर में सही सबूत नही पाया। लक्ष्मणपुर बाथे का यह मामला और आरोपियों का बरी होना कोई अकेला मामला नही है। मियांपुर, बथानी टोला , नगरी जनसंहार में आरोपियों के बरी होने के मामले के साथ इसे देखा जाना जरुरी है। आखिर ऐसा क्यों हैं कि राज्य समाज के कमजोर तबके को न्याय दिलाने में नाकाम होती दिख रही है।

दरअसल मगध की शांति के नव महारथियों के तिकड़म उस वक्त नुमाया हो गए जब हजारों की भीड़ आतंक मचाती पटना पहुंची और पटना की छाती पर चढ़कर सत्ता को खुलेआम मुंह चिढ़ाया । पटना का प्रतिरोध नदारद था। पटना दब्बू साबित हुई, हुक्मरान नजर चुराते रहे। सत्ता के सीने पर उत्पात मचाती यह भीड यह वो भीड नही थी जेपी के बुलावे पर गांधी मैदान आ जमी थी। ना इस भीड़ का सचिवालय के सामने की उन आदमकद मूर्तियों से कोई साम्य था जो सन बयालीस के आंदोलन में आजादी के लिए होम हो गयी । इस घटना ने 2006 में पैदा हुई उम्मीदों के आगामी पराभव का संकेत दे दिया था। इस भीड़ की मौजूदगी पटना के बीमार होने का बयान था।  उस बीमार पटना का जिसके पैरो तले की जमीन उन सभ्यताओं और महामानवों की कब्रों से पटी पड़ी है जिन्होंने हजारों साल पहले दुनिया भर के लोगों को अचंभित कर दिया था। यह भीड़ उन मुखिया जी की मौत पर तांडव मचा रही थी जिन्होंने गर्भ में पल रहे बच्चों के कत्ल को यह कहकर जायज ठहराया कि इससे नक्सलियों की नई खेप पैदा होगी। यह महज दुर्संयोग नही है कि इन मुखिया जी के हत्यारे भी पाटलिपुत्र की जेल की बजाय हवा में है। दरअसल मगध की शांति सही और गलत के बीच चयन का जोखिम नही पाल सकती। वह तो क्षुद्र स्वार्थों से संचालित होती है।

आवासीय और प्रवासीय दोनों ही टाइप के बिहारी अक्सर बातचीत में बुद्ध, महावीर से लेकर चंद्रगुप्त , अशोक के बिहार की धरती से संबंद्ध होने का हवाला देते है। शिक्षा की चर्चा होती है तो नालंदा, विक्रमशीला पर गर्वान्वित होते हैं। दरअसल वर्तमान की बदतरी का दलदल उन्हें इतिहास का आश्रय लेने को मजबूर करता है। खुद को दिलासा देने और सामने वाले के सवाल से उबरने को वे इस डिफेंसिव मैकेनिज्म का इस्तेमाल करते हैं।

और वैसे भी उस पटना से क्या उम्मीद की जाय, जिसकी पहचान गोलघर है। सेना के लिए बना गोदाम , जिसके जन्मदोष ने उसे कहीं का न छोड़ा, दरवाजे बाहर की बजाय अंदर से खुलने वाले। कूपमंडूक पटना का सौ फीसदी सटीक प्रतीक है गोलघर।

राइट टू रिजेक्ट का इस्तेमाल यानि कि आप कायर हैं ...

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
1.आप राहुल भैया को भी वोट नही देंगें , आप नरेंद्र मोदी के घोर विरोधी हैं , आप `आप` वाले केजरीवाल को किसी लायक नही मानते , आप सपा, बसपा को भी वोट नही देंगें , निर्दलीय पर भी मुहर नही लगाएंगें , आप राइट टू रिजेक्ट पर बटन दबाएंगें ... दरअसल आप पलायनवादी है ... आपको मुफ्त की खाने की बीमारी है ... जब इतना ही असंतोष है तो चुनाव में खड़े हो जाइए और यदि बचना ही चाहते हैं तो अपने आस पास के किसी शख्स को जो आपकी नजर में परफेक्ट हो उसको मैदान में लाइए ... वरना इतना याद रखिएगा राइट टू रिजेक्ट वाले बटन का इस्तेमाल आपकी कायरता का प्रमाण पत्र है, और कुछ भी नही ... इस थोथेबाजी का कोई मतलब नही कि कोई भी आपके मानदंडो पर खरा नही ... हम कम से कम इतना तो कर ही सकते है कि उम्मीदवारों की तुलना कर कम बुरे इंसान को लोकतंत्र के मंदिर में स्थापित करें । राइट टू रिजेक्ट वाला बटन नकारात्मकता का परिचायक है ... और आपके पास इसके लिए यदि समाज की बेहतरी का तर्क है तो फिर फिर इतना तो याद रखना ही होगा कि बेहतर समाज का निर्माण सकारात्मक प्रयासों से ही संभव है।

2.आप राइट टू रिजेक्ट वाला बटन दबाएंगें क्योंकि आपके मुताबिक सारे अयोग्य हैं , आप चुनावी मैदान में भी नही उतरेंगें क्योंकि आपके मुताबिक फिर आपको ब्लैक मनी के समंदर का गोताखोर बनना पड़ेगा (और आप तो ईमानदारी की प्रतिमूर्ति हैं न, ऐसा पाप कैसे कर सकेंगें) ... कोई नया मैदान में आएगा तो कहेंगें कि वोटकाटू हैं या फिर हो न हो यह भी अपनी गाड़ी का डीजल चुनाव के बाद वसूलेगा ... आप ही सोचिए आपके पास जब कुछ नही करने के अनगिनत तर्क है, अनेकों मजबूरियां हैं तो उनका क्या जो चुनावी दंगल में चित-पट में लगे हैं ... ऐसे में आपके राइट टू रिजेक्ट वाले बटन का इस्तेमाल आपके स्वार्थपने को साबित करेगा कि जो आजन्म ईमानदार दिखने का स्वार्थ भी पाले हुए है और सामने वाले को गरियाने-गलियाने का मौका भी नही छोड़ना चाहता ... राजनीतिक दल समाज से अलग किसी बियावान जगत की पैदावार नही है , वो आपकी इन्हीं छद्म ईमानदारी और स्वार्थपने की फसल काट रहे हैं ... इसलिए बेहतर उम्मीदवार पर मुहर ही एकमात्र विकल्प है ... और वो एक कहावत तो आप जानते ही हैं - आप बदलिए , जग बदलेगा ।

(फेसबुक पर किए दो अपडेटों का समुच्चय)

न्युरॉनों से मनुहार

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
तंत्रिका तंत्र के 
करोड़ों न्यूरॉनों के गुच्छों में
न जाने कौन सा गुच्छा
सुस्त हो गया है
या फिर सुप्त हो गया है
कि हंसी और हताशा 
दोनों ही हालातों को बयां करने में
चेहरा असमर्थ होता है

शरीर की भाव-भंगिमा
चेहरे का चाल-चलन
और मन के बीच का स्वाभाविक विद्युत-प्रवाह
समय के चक्रव्यूह में
अभिमन्यु बन चुका है

द्रोणाचार्य विपक्षी खेमे में है
अर्जुन को आवाज लगाई जा रही है।

चुनार बरास्ते मिर्जापुर – समय सुस्त , इतिहास पस्त

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
82.5 डिग्री पूर्वी देशांतर , मिर्जापुर, उल्टा प्रदेश , इंडियन स्टैंडर्ड टाइम वाली रेखा यहां से गुजर जाती है , बिना किसी हरहर खटखट के। लेकिन मिर्जापुर की सड़कों और गलियों में समय कमोबेश ठहरा सा ही लगा। उत्तर-पूर्व वाले न जाने कब से चिल्ला रहे हैं भाई कब करोगे बदलाव। न जाने कितने असंख्य घंटो की लाश बिछाई है यहां के घंटाघर ने । कहते हैं कि कलियुग है , कोई फरियाद नही , कोई न्याय नही और वैसे भी अमरीकी असीम न्याय से तो आप वाकिफ हैं ही। पिछले साल द वीक में रिपोर्ट पढ़ी मिर्जापुर के कलॉक टावर पर समय रुक गया है। यानि इस घंटाघर को इस घनघोर अपराध का दंड इसी जमाने में मिला। घंटाघर पर टंगी घड़ी मर चुकी है, अब कोई टिक-टिक नही , पिछले करीब दर्जन भर साल से। आश्चर्य कि हम अब भी इस मरी घड़ी के चक्कर में चकरा रहे है। खैर ... अपना अपना दुर्भाग्य।

दरअसल इतिहास में ताकाझांकी का लालच हमें मिर्जापुर खींच लाया था । मिर्जापुर मेरे लिए दरअसल वो टाइममशीन थी , जिसमें घुस जाउं , वर्तमान को गच्चा दूं और इतिहास में गोता लगाऊं। इतिहास कुछ मेरा वाला और कुछ राजा-महाराजा-बादशाहों-हाकिमों वाला। जिन लोगों ने नीरजा गुलेरी की चंद्रकान्ता से बचपन की शुरुआत की हो , चुनारगढ़ का जिक्र उनके मानवी शरीर में चुनचुनी या फिर खुजली तो जरुर पैदा करेगा। बात उस दिन की कर रहा हूं जब पता चला कि चुनार कुछ दर्जन भर किलोमीटर पर है। आपसे क्या छिपाना, खूंखार शिवदत्त, मासूम कलावती , चालू तारा , पंडित बदरी और सेनापति सोम सब खूबसूरत बचपन का हिसाब मांगते दिखे। कलावती का अथाह प्रेम , शिवदत्त-तारा का प्लैटोनिक रिश्ता , चाणक्य का चुनारी संस्करण बदरीनाथ , सोमनाथ की लॉएल्टी ... न जाने इनने दिल-दिमाग के कोनों को कितना एक्सपैंड किया , इसे कूतना सरासर नमकहरामी होगी ।

जब समझदारी शैशवावस्था में ही थी , हम मालवीय जी की बगिया बीएचयू में घुसपैठ कर बैठे। ठीक उसी दिन जब बैंडिट क्वीन वाली फूलन देवी कत्ल कर दी गयी। फूलन को बंदूक उठाए हमने अपने बचपन में तब देखा था जब दलसिंहसराय में लक्ष्मी कचड़ी वाले के सुबहिया दुकान पर आलूदम खाने पहुंचे। माथे पर लाल पट्टी लपेटे फूलन वाला पोस्टर कचड़ी-आलूदम के खोमचे से सटी दीवार पर चिपका पड़ा था। खैर बात यह है कि यह फूलन भी मिर्जापुर वाली है।

खैर बीएचयू में चर ही रहे थे कि पता चला बगल में ही नौगढ़, विजयगढ़, चुनारगढ़ विराजमान है। गर्दन के नीचे खुजली मचने लगी। एक सुबह आठ-दस दोस्त कूच कर गए शिवदत्त-तारा-कलावती की तलाश में। इतिहास ग्रेजुएशन में सब्जेक्ट था तो इतना तो पता चल ही गया अपने सासाराम वाले शेरशाह को दिल्ली का शाह बनाने में चुनार ने कोई कम कंट्रीब्यूट नही किया। ... तो हम मिर्जापुर की सड़क पर थे, चुनार वाले किले के पथ पर।

... और आप तो जानते हैं कि हमलोग अतुल्य भारत वाले हैं। खोदा पहाड़ निकली चुहिया मार्का। चुनार पहुंचे और सारी दिल-दिमाग की सारी चुनचुनी शांत हो गयी। दीवारें दरकी हुई, किले का कारागार मानवीय नायट्रोजन से गंधाया हुआ और आस-पास का हर 5 से 50 बरस वाला इतिहासकार इरफान हबीब । पहुंचने के साथ ही इतिहासकारों की युवा टोली ने चारों तरफ घेरा डाल दिया । हमलोग भी होशियार। पंद्रह रुपए के पैकेज में चुनार के इतिहास को समझाने-समझने का करार हुआ। अब देखिए एक पर एक गोला फलां जगह पर धर्मेंद्र का घोड़ा हिनहिनाया , फलां जगह पर राजा साहब नाच देखते थे और फलां जगह पर रानी नहाती थी। शिवदत्त, कलावती और तारा तो खैर गायब थे ।लगा मानो चुनारगढ़ की चहारदीवारी के भीतर इतिहास का कत्ल हो चुका हो और लाश भी मौके से गायब कर दी गयी हो। इक्का-दुक्का संरचनाएं बची थी , और जो बची थी उनके कत्ल के भी पूरे इंतजामात थे।यानि कुल मिलाकर मामला ऐसा था कि चुनार के इतिहास, वर्तमान और रहस्य पर चूना पोता जा चुका था। (यादें)




गोलघर , तुम तो धोखेबाज निकले …

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
ईस्ट इंडिया कंपनी के इंजीनियर जॉन गार्स्टिन ने शायद सपने में नही सोचा होगा कि उसकी गलती को पटना अपने सर-माथे उठा लेगा। वारेन हेस्टिंग्ज भी नरक में बैठा हंस पड़ेगा, जब उसे मालूम होगा कि हजारों साल के समृद्ध इतिहास को समेटे पाटलिपुत्र की पहचानों में उसके द्वारा बनवाया गया अनाज का वो गोदाम भी है जो उसने सेना के लिए अनाज जमा करने के मकसद से बनवाया था । ... और खैर मेगास्थनीज तो अपना सर ही पीट लेगा , जो चंद्रगुप्त मौर्य के काल में पाटलिपुत्र पहुंचा और मगध की राजधानी की ठाठ-बाट देखकर दंग रह गया ।  आखिर आप ही बताइए दिल्ली का कुतुब मीनार और लाल किला , आगरा का ताजमहल , कलकत्ता का विक्टोरिया की तर्ज पर पटना की पहचान गोलघर से हो ,कितना जायज है।

जॉन गार्स्टीन
बचपन की बात है । जी. के. की किताबों में मन खूब रमता था। रट्टा मारकर राज्य राजधानी रटने से सफर जो शुरु हुआ वो अब भी बदस्तूर जारी है। समय के साथ जी के की किताबें भी बदली। पहले वीणा बिहार दर्पण की जगह उपकार मिनी सामान्य ज्ञान , और फिर उपकार डायजेस्ट और फिर भारी भरकम सामान्य ज्ञान दिग्दर्शन और आगे न जाने कितने अगड़म-बगड़म । यानि बाहर की अनंत दुनिया ने शुरु से ही आकर्षित किया। लेकिन दो चीजें शुरुआत से ही जम गयी। पटना का गोलघर और कलकत्ता का विक्टोरिया। लेकिन तब दलसिंहसराय से बाहर की मंजिल या तो अपना पुश्तैनी गांव पान पतैली था या फिर नानीघर रोसड़ा यानि सारा मामला अपने जिले की चौहद्दी के भीतर का।

जब भी पटना दूरदर्शन पर शाम का बुलेटिन आता स्क्रीन पर गोलघर लटकता दिखता, रोजाना के इस दूरदर्शनी दर्शन के बीच गोलघर के लिए आकर्षण तीव्र से तीव्रतर होता गया। भांति-भांति की बातें सुन रखी थी इस मुए गोलघर के बारे में । सुन रखा था कि गोलघर पर चढ़िए तो पूरा पटना साक्षात दिखता है। हालांकि पटना कितना दिखता है , इस पर भिन्न-भिन्न संप्रदायों के अलग-अलग दावे थे। किन्हीं का आधा तो किंन्ही का पूरा दिखने का दावा , और वो भी पूरे प्रामाणिक आंकड़ों के साथ। इन्हीं परिस्थितियों में एक दूर के रिश्ते के जीजा जी अवतरित हुई , जिनके भाई साहब पटना में डॉक्टर बनने को कोशिशरत थे। मौका माकूल था , हम भी पटना गमन के लिए उनके साथ संलग्न हो गए।

अब पटना तो पहुंच गए लेकिन गोलघर ले जाने से हमारे जीजा जी मुकर गए। मामला सरासर धोखे का था, लेकिन आखिर फरियाद किससे की जाय। तीन-चार दिन गुजर गए। सामने के कब्रिस्तान को देख-देखकर दिमाग मुरझाने लगा। हालांकि इतना बड़ा कब्रिस्तान भी मेरे लिए किसी अजूबे से कम नही था। आखिरकार जीजाजी के भाई के रुम पार्टनर को मुझ पर तरस आ गया। एक दोपहर कब्रिस्तान को घूर ही रहा था कि अचानक गोलघर के लिए कूच के दिव्य वचन उनके मुख से फूट पड़े । कमरे के कोने में पड़ी सायकिल को पुचकारा गया। हैंडल और सीट के बीच की पाइपनुमा पर टंगकर न जाने कितनी गलियों से गुजरकर पहले गांधी मैदान और फिर गोलघर पहुंचा। गर्मी के दिन थे। धूप आसमान से बरस रही थी। मुश्किल से दर्जन भर दर्शनार्थी होंगें। कुछ सीढ़ियों पर, कुछ गोलघर के ऊपर तुलसी-चौरा जैसी बनी संरचना के इर्द-गिर्द और एक-दो मलाई बरफ वाले ठेले के आस पास धूप से झोंटा-झोंटी करते। बालू और ईंटें इधर-उधर बिखरी हुई थीं। धूप ने पहले ही दिमाग के तरल को सोख लिया था, लेकिन सालों से जो इच्छा मन में कुलबुला रही थी उसने इन कमजोर क्षणों में ग्लूकोन-डी की खुराक दी।

किसी तरह ऊपर चढ़ा , धूप का तीखापन त्वचा को पारकर हड्डियों तक पैठ गया। नजर इधर-उधर की, एक तरफ गंगा मैया लहरा रही थी तो एक तरफ गांधी मैदान पसरा हुआ था। तुलसीचौरा जैसी सरंचना पर शरीर टिकाकर गोलघर को महसूस करने लगा । इस स्तूपाकार संरचना के शीर्ष पर बैठा-बैठा इतिहास और वर्तमान को मथने लगा। फिर खुद ब खुद भीतर से सवाल फूटा- आखिर गोलघर की जिद किस लिए ? ठग लिये जाने का भाव दिल-दिमाग में उफान मारने लगा, जैसे आपने दाम तो दूध वाली कुल्फी के दिए हों लेकिन कुल्फी वाला आपको रंगीन पानी वाला थमाकर चला गया हो। आखिर क्या है इसमें ऐसा कि पटना की पहचान गोलघर से की जाय । पांव के अगल-बगल गुटखेबाजी के निशान जमकर थे। मधु और शिखर की पन्नियां बिहार में प्रचलित ब्रांडों का एलान कर रही थी। सीढ़ियां मरम्मत की मांग कर रही थी। गोलघर की दीवारें पुताई को तरस रही थी। अंदर जाने का दरवाजा न जाने किस जमाने से बंद था। अगल-बगल की हालत किसी दूरदराज के गांव के प्राइमरी स्कूल की याद दिला रहा था।


गोलघर के हाथों मिले इस धोखे ने मन खट्टा कर दिया । वो कहते हैं न, रहा भी न जाय और सहा भी न जाय , वही वाली बात हो गयी। यानि बिल्कुल शादी का लड्डू टाइप वाला मामला ठहरा , खाए तो भी पछताए और न खाए तो भी पछताए।